Sunday, April 27, 2014

जन्म दिन मुबारक सत्यम

जन्म दिन मुबारक सत्यम






प्रिय मेरे नन्हे मुन्ने दोस्तों आदरणीय और प्रिय मित्र गण आज हमारे सुपुत्र  गिरीश कुमार शुक्ल 'सत्यम' का जन्मदिन है इस शुभ अवसर पर जैसे हम दूर दूर से दुवाए दे आज सत्यम का जन्म दिन मना  रहे हैं आप के लिये ये केक और मुख मिठास का यहॉं अयोजन है क़ृपया अपना स्नेहिल आशीष अपने  सत्यम को प्रदान करें आइये बच्चों को भरपूर प्रेम दें और अपनी इस भावी पीढ़ी को अपनी प्यारी संस्कृति और इस भारत भू के प्रेम , प्यार से भर दे ताकि इस भारत भू की रज मे ये पौधे खिलें खिलखिलाएं और इस अपने चमन को अपने सत्कर्मों से गुलजार करें गुल गुलशन महके और हम सब इस फुलवारी का आनन्द ले सकें

आप सब का बहुत बहुत आभार 



प्रिय सत्यम ये ख़ुशी का दिन बार बार यूं ही आये प्रभु तुम्हे दीर्घायु करे खुशियाँ फलें फूलें इस ऑगन मे , अपने प्रेम सुकर्मों से सब का मन जीतो सब के प्यारे बनो समाज़ मे अपने अस्तित्व को अपने नाम की छाप बनाओ जन्म दिन मुबारक हो

पिताश्री और समस्त परिवार
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
प्रतापगढ़ भारत

बच्चे मन के सच्चे हैं फूलों जैसे अच्छे हैं मेरी मम्मा कहती हैं तुझसे जितने बच्चे हैं सब अम्मा के प्यारे हैं --



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Monday, February 24, 2014

जो मुस्का दो खिल जाये मन


जो मुस्का दो खिल जाये मन
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खिला खिला सा चेहरा  तेरा
जैसे लाल गुलाब
मादक गंध जकड़ मन लेती
जन्नत है आफताब
बल खाती कटि सांप लोटता
हिय! सागर-उन्माद
डूबूं अगर तो पाऊँ मोती
खतरे हैं बेहिसाब
नैन कंटीले भंवर बड़ी है
गहरी झील अथाह
कौन पार पाया मायावी
फंसे मोह के पाश
जुल्फ घनेरे खो जाता मै
बदहवाश वियावान
थाम लो दामन मुझे बचा लो
होके जरा मेहरबान
नैन मिले तो चमके बिजली
बुत आ जाए प्राण
जो मुस्का दो खिल जाए मन
मरू में आये जान
गुल-गुलशन हरियाली आये
चमन में आये बहार
प्रेम में शक्ति अति प्रियतम हे!
जाने सारा जहान
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२०.०२.२०१४
४.३०-५ मध्याह्न
करतारपुर जालंधर पंजाब



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Thursday, October 10, 2013

खुश्बू फ़िज़ा मे बिखरी

खुश्बू फ़िज़ा मे बिखरी 
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(photo with thanks from google /net)


चेहरा तुम्हारा पढ़ लूँ
पल भर तो ठहर जाना 
नैनों की भाषा क्या है 
कुछ गुनगुना सुना-ना 
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आईना जरा मै  देखूँ 
क्या मेरी छवि बसी है 
इतना कठोर बोलने को 
कसमसा रही है …….
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आँखों मे आँखें डाले 
मै मूर्ति बन गया हूँ
पारस पारस सी हे री !
तू जान डाल जा ना
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खिलता गुलाब तू है 
कांटे भी तेरे संग हैं 
बिन खौफ मै ‘भ्रमर’ हूँ 
खिदमते-इश्क़ पेश आ ना 
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खुश्बू फ़िज़ा मे बिखरी 
मदमस्त है पवन भी 
अल्हड नदी यूँ दामन- 
को छेड़ती तो न जा 
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अम्बर कसीदाकारी 
अद्भुत नये रंगों से 
बदली है खोले घूँघट
कुछ शेर गुनगुनाना 
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सपने सुहाने दे के 
बिन रंगे चित्र ना जा 
ले जादुई नजर री !
परियों सी उड़ के ना जा 
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"मौलिक व अप्रकाशित" 
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'५
प्रतापगढ़
वर्तमान -कुल्लू हि . प्र.
09.10.2013
10.15-11.00 P.M.


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