KAVITA, LEKH, RAS-RANG,
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Tuesday, May 24, 2011
मेरी बिटिया जब आई तो
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मेरी बिटिया जब आई तो भोर हुआ इक नया सवेरा मलयानिल जैसे पुरवाई ! मन महका शीतलता छाई !! उमड़ घुमड़ घन छाये गरजे ! रिमझिम रिमझिम बादल बरसे...
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Wednesday, May 18, 2011
अभी मटकते जाती जो है – नदिया तीरे हलचल करती
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जेठ की दुपहरी से त्रस्त लोग बेचैन हों पारा गरम हो तो मन मुटाव लडाई झगडा और पनपते हैं यहाँ अब तो जरुरत है पौंशाला लगाया जाय-शीतल जल -मधुर पे...
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Wednesday, April 20, 2011
गुप-चुप-गुप-चुप रजनी आई !!!
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गुप-चुप-गुप-चुप रजनी आई !!! पहला मिलन अनोखा ऐसा कली से जब में फूल बनी नैनो का वो आमंत्रण कितने आये और गए होठों की मुस्कान ख...
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