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Saturday, June 4, 2016

खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं जब से उसने मुझको देखा ...

खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं
जब से उसने मुझको देखा ...
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कोमल गात हमारे सिहरन
छुई मुई सा होता तन मन
उन नयनों की भाषा उलझन
उचटी नींदें निशि दिन चिंतन
मूँदूँ नैना चित उस चितवन ....
खुद बतियाती गाती हूँ मैं ....
खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं
जब से उसने मुझको देखा ...

होंठ रसीले मधु छलकाते
अमृत घट ज्यों -भौंरे आते
ग्रीवा-गिरि-कटि-नाभि उतर के 
बूँद-सरोवर-झील नहाते
मस्त मदन रति क्रीड़ा देखे ……..
छक मदिरा पी लड़खड़ा उठूँ मैं………
खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं
जब से उसने मुझको देखा ...

काया कंचन चाँद सा मुखड़ा
प्रेम सरोवर हंस वो उजला
अठखेली कर मोती चुगता
लहर लहर बुनता दिल सुनता
बात बनी रे ! रात  पूर्णिमा ...
ज्वार सरीखी चढ़ जाऊं मैं ...
खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं
जब से उसने मुझको देखा ...

लहर लहर लहरा जाऊं मैं
भटकी-खोती-पा जाऊं मैं
चूम-चूम उड़ छा जाऊं मैं
बदली-कितनी-शरमाऊं मैं
बांह पसारे आलिंगन कर ...
दर्पण देख लजा जाऊं मैं ...
खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं
जब से उसने मुझको देखा ...


अब पराग रस छलक उठा है
पोर-पोर हर महक उठा है
कस्तूरी मृग जान चुका है
दस्तक दिल पहचान चुका है
नैनों की भाषा पढ़ पढ़ के ...
जी भर अब मुस्काऊँ मैं
खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं
जब से उसने मुझको देखा ...


सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर
११.३० -१२.१० मध्याह्न
..२०१६

कुल्लू हिमाचल भारत

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Sunday, April 17, 2016

जन्म दिन मुबारक हो प्रिये

प्रिय मित्रों आज मेरी भार्या और जीवन संगिनी माधुरी का जन्म दिन है बड़ी मधुरता और माधुर्य से भरा रहा जीवन का हर पल  उनके साहचर्य में सहचरी हो तो ऐसी  जो जीवन के हर रंग में पति  का साथ दे, मीठी मीठी यादें सुहाना सफर सदा यादगार बना रहे  , खुशियों से गम न महसूस होने देने कि उनकी कला ,
 , , प्रभु से प्रार्थना है कि वे  इन्हे सदा इसी तरह  प्रेम से सराबोर रखें ,  करुणा रस छलके,    स्वास्थ्य और मन सदा प्रफुल्लित बना रहे ...
आशा है आप सब का आशीष और दुवाएं भी .....
भ्रमर ५






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Saturday, May 9, 2015

हंसमुख नैन तिहारे प्रियतम



हंसमुख नैन तिहारे प्रियतम  
क्या क्या रंग दिखाते हैं
नाच मयूरी सावन रिमझिम
घायल दिल कर जाते हैं
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हर इक आहट नजर थी रहती
प्यासे नैन थे पर फैलाये
पलक पांवड़े स्वागत खातिर
कब निकले तू नैन समाये
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कभी ओढ़नी होंठ दबाये पग ठुमकाये
कटि तक तू बल खाए
तिरछे नैन से बाण चलाये
अरी कभी तो बिना मुड़े चली जाए
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कभी देखने चाँद चांदनी
दिवस निशा छत पर तू आ जाये
कभी कैद बुलबुल सी पिजड़े
हिलता -पर्दा प्रिय री बहुत सताए
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कभी फूल पौधे कपड़ों  में
छवि तेरी बस जाये
रहूँ ताकता पहर-पहर भर
हो अवाक् मै, होठों गीत विरह धुन छाये
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भीड़  से छिपता नीरव निर्जन
काश कभी प्यारी मूरति वो आ ही जाए
गहरी सांस मै सपने उड़ता
तुझसे मन खूब बातें करता -
धरती पर गिर जाए
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चंचल शोख हसीना हे री !
तू गुलाब तू कमल कली रे
जनम -जनम का नाता तुझसे
'भ्रमर ' के तो  तू प्राण बसी रे
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आओ करें सुवासित जग को
'खुशबू' सुरभित ये जग फैलाएं
प्रेम-प्यार उपजे हर बगिया
सुख हो-खुशियाँ -
दिल अपने दिल में बस जाएँ
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कभी कसे गोदी बच्चों को
कन्धे माँ छुप कभी निहारे
बड़े रूप देखूं नित प्रियतम
तीर -मार घायल कर जाए
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बेकरार कर सखी री ना सताइये
पढ़ ले दिल की ये किताब लौट आइये
मदहोशी पगली बहकी यूं ना जाइए
दिल के आशियाने सुकूँ लौट आइये
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नैन झुकाये पास तो आती
चितए जब- हो जाती दूर
मै भी -तू - मुस्काती फिरती
पल-पल इतना चंदा मामा फिर भी दूर
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
कुल्लू हिमाचल
७ .०० पूर्वाह्न
७.५.२०१५



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Saturday, November 15, 2014

बेवफा

बेवफा ( खेल समझकर दिल क्यों  तोड़ जाते हैं वे ) 
घर फूटा मन टूटा बिच्छिन्न हुए अरमान 
मैंने पाया विश्वास गया
ठेस लगी टूटा अभिमान 
एकाकी जीवन रोता दिल
नासूर बनी खिलती कलियाँ 
जल जाएँ न सुन विरह गीत 
मिट जाएँ न अभिशप्तित परियां 
लूट मरोड़ मुकर क्यों जाते
ऐ सनम जो तुझसे दिल न लगाते
बाँध ले घुंघरू तज गेह नेह
सुख भर ले नित दिल टूट देख
ना धूमिल कर छवि नारी की
दिल दे न चढ़े बलि बेचारी
प्यार बना आधार बचाए घर कितने
सोने पर सोना छोड़
ले देख जरा तुझसे कितने

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
राय बरेली - प्रतापगढ़

७.९.१९९३ 



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Sunday, August 24, 2014

हे री ! चंचल


  • हे री ! चंचल

    • हे री ! चंचल
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    (photo with thanks from google/net)
    जुल्फ है कारे मोती झरते
    रतनारे मृगनयनी नैन
    हंस नैन हैं गोरिया मेरे
    'मोती ' पी पाते हैं चैन
    आँखें बंद किये झरने मैं
    पपीहा को बस 'स्वाति' चैन
    लोल कपोल गाल ग्रीवा से
    कँवल फिसलता नाभि मेह
    पूरनमासी चाँद चांदनी
    जुगनू मै ताकूँ दिन रैन
    धूप सुनहरी इन्द्रधनुष तू
    धरती नभ चहुँ दिशि में फ़ैल
    मोह रही मायावी बन रति
    कामदेव जिह्वा ना बैन
    डोल रही मन 'मोरनी' बन के
    'दीप' शिखा हिय काहे रैन
    टिप-टप  जल बूंदों की धारा
    मस्तक हिम अम्बर जिमि हेम
    क्रीडा रत बदली ज्यों नागिन
    दामिनि हिय छलनी चित नैन
    कम्पित अधर शहद मृदु बैन -
    चरावत सचराचर दिन रैन
    सात सुरों संग नृत्य भैरवी
    तड़पावत क्यों भावत नैन ?
    हे री ! चंचल शोख विषामृत
    डूब रहा , ना पढ़ आवत तोरे नैन !
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    सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'५
    11-11.48 P.M.
    26.08.2013
    कुल्लू हिमाचल 
    दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

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Friday, May 30, 2014

मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो...


(photo with thanks form google/net)

जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे
और तुम …..
मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो...
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केशुओं से झांकते तेरे नैन दोनों
प्याले मदिरा के उफनते लग रहे
काया-कंचन ज्यों कमलदल फिसलन भरे
नैन-अमृत-मद ये तेरा छक पियें
बदहवाशी मूक दर्शक मै खड़ा
तुम इशारों से ठिठोली कर रही हो
जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे
और तुम ..
मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो
इस सरोवर में कमल से खेलती
चूमती चिकने दलों ज्यों हंसिनी
नीर झर-झर तेरे लव से यों झरें
चूम कर मोती बनाऊं मन करे
मै हूँ चातक तू है चंदा दूर क्यों
छटपटाता चांदनी से मन जले
जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे
और तुम ..
मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो
इस सरोवर में झुकी जब खेल खेले लहर से
देख सब कुछ कांपते अधरों से सारे ये कमल
तू कमलिनी राज सुंदरता करे दिखता यहां
तार वीणा ....मेरा मन झंकृत करे
होश में आऊँ तो गाऊँ प्रेम-धुन मै री सखी
काश नजरें हों इनायत इस नजर से आ मिलें
जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे
और तुम ..
मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो
भोर की स्वर्णिम किरण तू स्वर्ण सी
है सुनहली सर की आभा स्वर्ग सी
देव-मानव सब को प्यारी अप्सरा सी
नृत्य छन-छन पग के घुँघरू जब करें
मन मयूरा नाचता विह्वल सा ये
मोरनी सी तू थिरकती क्यों फिरे
जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे
और तुम ..
मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो
.

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर '५
कुल्लू हिमाचल २४.५.२०१४
५.४५-६.१० पूर्वाह्न


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं




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Saturday, May 17, 2014

कौन हो तुम प्रेयसी ?

कौन हो तुम प्रेयसी ?

कौन  हो  तुम  प्रेयसी ?
कल्पना, ख़ुशी या गम
सोचता हूँ मुस्काता हूँ,
हँसता हूँ, गाता हूँ ,
गुनगुनाता हूँ
मन के 'पर' लग जाते हैं
घुंघराली  जुल्फें
चाँद सा चेहरा
कंटीले कजरारे नैन
झील सी आँखों के प्रहरी-
देवदार, सुगन्धित काया  
मेनका-कामिनी,
गज गामिनी
मयूरी सावन की घटा
सुनहरी छटा
इंद्रधनुष , कंचन काया
चित चोर ?
अप्सरा , बदली, बिजली
गर्जना, वर्जना
या कुछ और ?
निशा का गहन अन्धकार
या स्वर्णिम भोर ?
कमल के पत्तों पर ओस
आंसू, ख्वाबों की परी सी ..
छूने जाऊं तो
सब बिखर  जाता है
मृग तृष्णा सा !
वेदना विरह भीगी पलकें
चातक की चन्दा
ज्वार- भाटा
स्वाति नक्षत्र
मुंह खोले सीपी सा
मोती की आस
तन्हाई पास
उलझ जाता हूँ -भंवर में
भवसागर में
पतवार पाने को !
जिंदगी की प्यास
मजबूर किये रहती है
जीने को ...
पीने को ..हलाहल
मृग -मरीचिका सा
भरमाया फिरता हूँ
दिन में तारे नजर आते हैं
बदहवाश अधखुली आँखें
बंद जुबान -निढाल -
सो जाता हूँ -खो जाता हूँ
दादी की परी कथाओं में
गुल-गुलशन-बहार में
खिलती कलियाँ लहराते फूल
दिल मोह लेते हैं
उस 'फूल' में
मेरा मन रम जाता है
छूने  बढ़ता हूँ
और सपना टूट जाता है
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
७-७.२० मध्याह्न
२३.०२.२०१४
करतारपुर , जालंधर , पंजाब





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