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Sunday, June 5, 2016

शादी की साल गिरह

मित्रों जय श्री राधे .. आइये आज आप के भ्रमर जी की शादी की साल गिरह है तो कुछ मीठा हो जाए इस अवसर पर आप सब से आशीष और दुआवों की ख्वाहिश है आशा है बरसेगा प्रेम ...

बहुत सुहाना सफर रहा इस दौरान मेरी प्रियतमा माधुरी के संग , अधिक बखानना नहीं चाहिए कहीं नजर न लग जाए , ...आज पूजा अर्चना , मंदिर जाना , कुल्लू के व्यास दरिया में पूजन , नेचर पार्क कुल्लू हिमाचल में विचरण , विशिष्ट खान पान और बहुत कुछ आनंद दाई क्षण , भगवान भी आज मेहरबान है शायद बरस पड़ें ...

थोड़ा लिखना और ज्यादा समझना आप सब से मित्र पा ह्रदय गदगद हो जाता है 

राधे राधे

आप का भ्रमर












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Saturday, June 4, 2016

खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं जब से उसने मुझको देखा ...

खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं
जब से उसने मुझको देखा ...
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कोमल गात हमारे सिहरन
छुई मुई सा होता तन मन
उन नयनों की भाषा उलझन
उचटी नींदें निशि दिन चिंतन
मूँदूँ नैना चित उस चितवन ....
खुद बतियाती गाती हूँ मैं ....
खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं
जब से उसने मुझको देखा ...

होंठ रसीले मधु छलकाते
अमृत घट ज्यों -भौंरे आते
ग्रीवा-गिरि-कटि-नाभि उतर के 
बूँद-सरोवर-झील नहाते
मस्त मदन रति क्रीड़ा देखे ……..
छक मदिरा पी लड़खड़ा उठूँ मैं………
खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं
जब से उसने मुझको देखा ...

काया कंचन चाँद सा मुखड़ा
प्रेम सरोवर हंस वो उजला
अठखेली कर मोती चुगता
लहर लहर बुनता दिल सुनता
बात बनी रे ! रात  पूर्णिमा ...
ज्वार सरीखी चढ़ जाऊं मैं ...
खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं
जब से उसने मुझको देखा ...

लहर लहर लहरा जाऊं मैं
भटकी-खोती-पा जाऊं मैं
चूम-चूम उड़ छा जाऊं मैं
बदली-कितनी-शरमाऊं मैं
बांह पसारे आलिंगन कर ...
दर्पण देख लजा जाऊं मैं ...
खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं
जब से उसने मुझको देखा ...


अब पराग रस छलक उठा है
पोर-पोर हर महक उठा है
कस्तूरी मृग जान चुका है
दस्तक दिल पहचान चुका है
नैनों की भाषा पढ़ पढ़ के ...
जी भर अब मुस्काऊँ मैं
खिली खिली खिलखिला उठूँ मैं
जब से उसने मुझको देखा ...


सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
११.३० -१२.१० मध्याह्न
२.६.२०१६

कुल्लू हिमाचल भारत

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Monday, June 8, 2015

गाल गुलाब छिटकती लाली




गाल गुलाब छिटकती लाली
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जुल्फ झटक मौका कुछ देती
अँखियाँ भरे निहार सकूँ
कारी बदरी फिर ढंक लेती
छुप-छुप जी भर प्यार करूँ
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इन्द्रधनुष सतरंगी सज-धज
त्रिभुवन मोहे अजब मोहिनी
कनक समान सजे हर रज कण
किरण गात तव अजब फूटती
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गहरी झील नैन भव-सागर
उतराये डूबे जन मानस
ढाई आखर प्रेम की गागर
अमृत सम पीता बस चातक
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गाल गुलाब छिटकती लाली
होंठ अप्सरा इंद्र की प्याली
थिरक रिझा मतवारी मोरनी
लूट चली दिल अरी ! चोरनी
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कंठ कभी कब होंठ सूखते
मति-मारी मद-मस्त हुआ
डग मग पग जब दिखे दूर से
पास खिंचा 'घट' तृप्त हुआ
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कंचन कामिनी कटि हिरणी सी 
नागिन ह्रदय पे लोट गयी
चकाचौंध अपलक बिजली सी
मंथन दिल अमृत -विष कुछ घोल गयी
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
६-६.५७ मध्याह्न
कुल्लू हिमाचल प्रदेश भारत
७-मई -२०१५
 


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Saturday, May 9, 2015

हंसमुख नैन तिहारे प्रियतम



हंसमुख नैन तिहारे प्रियतम  
क्या क्या रंग दिखाते हैं
नाच मयूरी सावन रिमझिम
घायल दिल कर जाते हैं
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हर इक आहट नजर थी रहती
प्यासे नैन थे पर फैलाये
पलक पांवड़े स्वागत खातिर
कब निकले तू नैन समाये
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कभी ओढ़नी होंठ दबाये पग ठुमकाये
कटि तक तू बल खाए
तिरछे नैन से बाण चलाये
अरी कभी तो बिना मुड़े चली जाए
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कभी देखने चाँद चांदनी
दिवस निशा छत पर तू आ जाये
कभी कैद बुलबुल सी पिजड़े
हिलता -पर्दा प्रिय री बहुत सताए
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कभी फूल पौधे कपड़ों  में
छवि तेरी बस जाये
रहूँ ताकता पहर-पहर भर
हो अवाक् मै, होठों गीत विरह धुन छाये
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भीड़  से छिपता नीरव निर्जन
काश कभी प्यारी मूरति वो आ ही जाए
गहरी सांस मै सपने उड़ता
तुझसे मन खूब बातें करता -
धरती पर गिर जाए
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चंचल शोख हसीना हे री !
तू गुलाब तू कमल कली रे
जनम -जनम का नाता तुझसे
'भ्रमर ' के तो  तू प्राण बसी रे
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आओ करें सुवासित जग को
'खुशबू' सुरभित ये जग फैलाएं
प्रेम-प्यार उपजे हर बगिया
सुख हो-खुशियाँ -
दिल अपने दिल में बस जाएँ
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कभी कसे गोदी बच्चों को
कन्धे माँ छुप कभी निहारे
बड़े रूप देखूं नित प्रियतम
तीर -मार घायल कर जाए
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बेकरार कर सखी री ना सताइये
पढ़ ले दिल की ये किताब लौट आइये
मदहोशी पगली बहकी यूं ना जाइए
दिल के आशियाने सुकूँ लौट आइये
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नैन झुकाये पास तो आती
चितए जब- हो जाती दूर
मै भी -तू - मुस्काती फिरती
पल-पल इतना चंदा मामा फिर भी दूर
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
कुल्लू हिमाचल
७ .०० पूर्वाह्न
७.५.२०१५



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