BHRAMAR KI MADHURI KAARAN AUR NIVARAN

Tuesday, May 24, 2011

मेरी बिटिया जब आई तो


मेरी बिटिया जब आई तो
kh baby-24.5.11-2
भोर हुआ इक नया सवेरा
मलयानिल जैसे पुरवाई !
मन महका शीतलता छाई !!
उमड़ घुमड़ घन छाये गरजे !
रिमझिम रिमझिम बादल बरसे !!
चहुँ दिशि में फैला उजियारा
मन मयूर अंगनाई नाचा !
बाप बना कोई-बना था चाचा !!
पास पडोसी जुट आये सब
थाल बजाये – गाये गाना
सोहर अवधपुरी का गाया !
मुंह मीठे मधु -रस घुल आया !!
दादा दादी फूल के कुप्पा !
लक्ष्मी शारद देते उपमा !!
दौड़ -दौड़ कर स्वागत करते
लक्ष्मी आज अंगनवा आई !
हहर हहर खुश उसकी माई !!
बहुरि गये दिन इस फुलवारी
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फूल खिला अब इस अंगनाई
P190511_06.41
व्यथा रोग सब हर ले भाई





देवी का प्रतिरूप है बेटी
वरद हस्त ले कर गृह आई !!
भर देगी आंगन घर तेरा
शुभ-शुभ जगमग तेरा डेरा
मान करे तू गले लगाये !
जितना प्यार इसे कर पाए !!
अरे लुटा दे खुले हाथ तू
दुगुना तू जीवन में पाए !!
यही कल्पना यही किरण है
प्रतिभा ममता सब कुछ ये
ये गंगा है सीता है ये
यही शीतला यही भवानी
दुर्गा भी ये चंडी मान !
धरती है सुख धन की खान !!
चरण पकड़ चल दे संग इसके
जीवन तू पाए सम्मान !!
सब से बड़ा दान कन्या का
कर पाए जो बने महान !!
दिया जला- फैला – उजियारा
अँधियारा अब कोसों दूर
बेटा -बेटी कभी न करना
मन में कभी न ऐसी भूल !!
जगमग ज्योति जलाये चलना
चरण चढ़ा ले पग की धूल !!
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२४.५.२०११ जल पी बी

Wednesday, May 18, 2011

अभी मटकते जाती जो है – नदिया तीरे हलचल करती


जेठ की दुपहरी से त्रस्त लोग बेचैन हों पारा गरम हो तो मन मुटाव लडाई झगडा और पनपते हैं यहाँ अब तो जरुरत है पौंशाला लगाया जाय-शीतल जल -मधुर पेय पिलाया जाय थोडा दान पुन्य करने से मन खुश होगा -जिसका भी मन शीतल होगा वह कुछ तो आशीष देगा ही ऊपर न सही मन से ही सही -मन में ख्याल आया की थोडा विश्राम किया जाय साये में किसी वट वृक्ष के बैठ -यमुना के किनारे तो -मधुर माधुरी रंग कुछ बरस पड़े -
थोडा कुछ हट के आप सब को शीतल करने की ख्व्वाहिस में -छवि माँ राधा और श्याम की लगी है सुन्दरता के लिए कृपया अन्यथा न लें -
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(फोटो साभार नेट /गूगल से लिया गया )

अभी मटकते जाती जो है – नदिया तीरे हलचल करती




मेरी बीबी बड़ी विनोदी
हर पल मुझको छेड़े
घन -घन घंटी कभी बजाकर
ध्यान हमारा तोड़े
गागर में सागर तू भर दे
श्याम हमारे - साजन मोरे
कह के माला फेरे!!




मन का कवि हूँ
मै सब समझूं
हमको- काला-कह के -कह के
चुटकी ले –है- नाचे !!

मै बोला -फिर-शुरू हो गया
पेट फुलाए- गगरी मोरी
गर्दन अरे सुराहीदार
पड़े पड़े- घर -सड़ जाएगी
मन ही मन- फिर- पछताएगी
अभी मटकते जाती जो है
नदिया तीरे-हलचल करती
घाट-घाट का- पानी पीती
कलरव करती -गाना गाती
धारा से उस नैन मिलाये
डुबकी लाये !!
मन ही मन में
खुश हो आती,
देखे भौंरे-तितली देखे
कलियों का वो फूल सा खिलना !!
उसकी पूजा हुयी ख़तम
तो उसने मुझको टोंका
या मेरा गुण गान कर रहे
मिला कहीं या न्योता ??
वाह-वाह तेरे साथी कर
पूडी तुझे खिलाएं
मन के उनकी बातें करके
मन जो उनके छाये ,
अगर कहीं कुछ गड़बड़ हो गई
“जूता”- हार -पिन्हायें !!
मै बोला- तूने- भटकाया
‘सुवरण’ के पीछे मै धाया
कवि जो होते ‘कायल’
नहीं बैठते चूड़ी पहने
घुंघरू वाला ‘पायल’ !!
बिजली -तितली अलि की कलियाँ
रंग -बिरंगी कर सोलह श्रृंगार
खड़ी हैं द्वारे – देखो जाओ
तेरे जैसा नहीं-
फुलाए मुँह -बैठी हैं
और लगाये ‘काजल’ !!
मुँह पकड़ा उसने जो मेरा
छटका -मै -कह अपनी बात
गागर में – सागर जो भर दूं
भरी रहे फिर – गगरी ये री !
क्यों वो यमुना जाये ?
‘सर’ के जैसा ही बस पानी
क्या ‘गंगा’-यमुना हो पाए??
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
१८.५.२०११ जल पी बी ४.५० मध्याह्न