BHRAMAR KI MADHURI KAARAN AUR NIVARAN

Tuesday, April 10, 2012

घूँघट कब ये खोले ?


होंठ रसीले लरज रहे हैं 
शायद रस-मधु घोले

चाँद सा मुखड़ा सूर्यमयी   है 
घूँघट कब ये खोले ?
नैन जादुई झील  से गहरे 
जीव जगत सब तरते 
ढाई आखर प्रेम ग्रन्थ में 
गहराई सब डूबे 
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Bhramar5
.१२-.२२ पूर्वाह्न 
..२०१२ कुल्लू यच पी 



please be united and contribute for society ....Bhramar5

4 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना है
...बहुत अच्छी रचना पढ़ने को मिली !!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुंदर प्रस्तुति

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

प्रिय संजय जी रचना आप के मन को छू पायी आप को भायी सुन मन गद गद हुआ
आभार
भ्रमर ५

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

आदरणीया संगीता जी रचना की प्रस्तुति आप को अच्छी लगी आप से समर्थन मिला ख़ुशी हुयी
आभार
भ्रमर ५